एक गीत
बल से जब महल खड़े होते
सिसकियाँ चुकातीं हैं किश्तें।
भूख नींद को काट काट कर
श्रद्धा सुख के सपने बोती,
जीवन याआपदा प्रबंधन,
सुख दुख नाजुक पलकें ढोती।
यादो की सूची में रहते ,
जाने अनजाने सब रिश्ते।
छत की एक जरूरत तनकर
दुत्कारे लाखों खुशियों को ।
संस्कारों की बलिबेदी पर
जलते देखा है सतियों को ।
रिक्त हाथ पर ममता भारी
भरती उम्मीदों के बस्ते।
बंधन तोड़े तन से साँसे,
तब मरघट से मिलती काया।
पंचभूत को हिस्सा देकर,
फफक फफक कर रोती माया।
उड़ता हंसा उड़न खटोला,
भूल भुलैया के तज रस्ते।
आशा देशमुख
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