Wednesday, 26 December 2018
एक गीत सादर समीक्षार्थ आदिम युग आदिम जमाने की तरफ मुड़ने लगी फिर सभ्यता। बस दो कदम ही चल सका युग रौशनी की राह में, दिनकर निकलता नित्य लेकिन जग भटकता स्याह में । पद अर्थ के प्रासाद में विद्या बनी परिचारिका, ढूढ़े कहाँ सुख चैन सच को हो गए सब लापता। विकलांग करके धर्म को भ्रम ,छल ,कपट ,धावक बनें। भोगी, विलासी ,लालची, विषयी, जगत तारक बने। पाखंड का व्यापार अरु विस्तार दोनों है वृहद आकाश तक भ्रष्टाचरण पाताल तक निर्लज्जता। धरती परोसे थाल पर मिटती नही सुरसा क्षुधा, कंचन महल में वारुणी दर दर भटकती है सुधा, कैसे करे अब भेद कोई कौन पशु है कौन नर, जब मानवी तन में भरी हो हिंस्र पशु सी क्रूरता। आशा देशमुख 24,6,2018 रविवार
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