Wednesday, 26 December 2018
एक गीत श्रम की पीड़ा श्रम सदा ही जीतता है ये कथन अक्सर सुना किन्तु श्रमिकों की दशा से मन भ्रमित होने लगा , आग चूल्हे में कहाँ रग अँतड़ियाँ जलने लगी, आँच से सहमा धुआँ पीड़ा नयन मलने लगी, हाँथ पैरोँ में सनी मिट्टी नमी है अश्रु की देखकर हालात ऐसे सच चकित होने लगा | दुग्ध स्नातित अप्सरा सी बस प्रगति दिखती क्षणिक स्वप्न टूटे कंठ सूखा स्वेद का बिखरा मणिक, रिक्त है घट सत्य का छल छल छलकता है अनृत लोभ के उन्माद से तप का अहित होने लगा | क्या नियंता रुष्ट है या खेल लालच स्वार्थ का , कर्म तो तल्लीन है इक सूत्र जप कर पार्थ का , बस प्रतीक्षा शेष अब पाताल से महि खुद हिले , आज जय का स्वर्ण रथ चढ़ छल फलित होने लगा | आशा देशमुख एनटीपीसी कोरबा
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