एक गीत
आपके समीक्षार्थ
आज केवल सच बचा है पास मेरे,
इसलिए तो लोग अब आते नहीं हैं।
एक जैसा रूप वाणी
आत्मा का,
नित करे आभार मन
परमात्मा का,
घूम आते दूर तक मायानगर में,
मोह के हम द्वार खटकाते नही हैं।
स्वर्ण के घट में रखे
सब लौह सिक्के,
जंग से उतरे सभी के
रंग पक्के,
मोहरों से भी न मिलती चंद खुशियाँ,
देखकर हम हाट मुस्काते नहीं हैं।
सत्य की पटती कहाँ
आडम्बरोँ से,
भय लगे अब पीर औ
पैगम्बरोँ से ,
धुन बजाता जा रहा मन हर गली में ,
गीत कोई प्रेम के गाते नहीं है।
आशा देशमुख
21-9-2018
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