Wednesday, 28 March 2018

एक गीत आप सबके समक्ष सादर प्रस्तुत व्यथा की कथा मन वचन अरु कर्म से अभिव्यक्ति का अधिकार हो, आसुरी छल वृत्तियों का दल सहित संहार हो। चार भागों में बँटी वनिता तुम्हारी वेदना, दौपदी सीता सती वृन्दा कहें या प्रेरणा। बस अनल ही पढ़ सके दाक्षायणी के पीर को, अश्रु भी ऐसे जला ज्यों धधकता अंगार हो। वाटिका प्रत्यक्षदर्शी थी प्रणय अरु शोक की, सूर्यकुल की स्वामिनी पर हा ! नियति विश्लोक की। बाग़ वन सरिता उदधि गिरि अंततः पाताल तक, भूमिजा की यात्रा इस भाँति क्यों स्वीकार हो। युग बदलता ही रहा बदली नही पर यातना, पदवियों के कृत्य से निष्प्राण होती प्रार्थना। न्याय दस्तावेज को वृन्दा पढ़ो इक बार फिर, पक्ष तो बल का रहा इस न्याय से इंकार हो। नीर सूखे थे तभी तो रक्त माँगा केश ने, नेह रिश्तों के महल में सेंध डाली क्लेश ने। दंभ मर्यादा क्षरें आशीष सब हों मौन तब, तुम उठो हे वेदिजा अपमान का प्रतिकार हो । आशा देशमुख 27 -3-2018-मंगलवार।

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