Monday, 23 April 2018
गीत 1 व्यथा की कथा मन वचन अरु कर्म से अभिव्यक्ति का अधिकार हो, आसुरी छल वृत्तियों का दल सहित संहार हो। चार भागों में बँटी वनिता तुम्हारी वेदना, दौपदी सीता सती वृन्दा कहें या प्रेरणा। बस अनल ही पढ़ सके दाक्षायणी के पीर को, अश्रु भी ऐसे जला ज्यों धधकता अंगार हो। वाटिका प्रत्यक्षदर्शी थी प्रणय अरु शोक की, सूर्यकुल की स्वामिनी पर हा ! नियति विश्लोक की। बाग़ वन सरिता उदधि गिरि अंततः पाताल तक, भूमिजा की यात्रा इस भाँति क्यों स्वीकार हो। युग बदलता ही रहा बदली नही पर यातना, पदवियों के कृत्य से निष्प्राण होती प्रार्थना। न्याय दस्तावेज को वृन्दा पढ़ो इक बार फिर, पक्ष तो बल का रहा इस न्याय से इंकार हो। नीर सूखे थे तभी तो रक्त माँगा केश ने, नेह रिश्तों के महल में सेंध डाली क्लेश ने। दंभ मर्यादा क्षरें आशीष सब हों मौन तब, तुम उठो हे वेदिजा अपमान का प्रतिकार हो । 2 उपवास सह सको उतना करो मन व्रत नियम तप साधना । जो प्रमाणिक सार सच है रीत या विज्ञान हो, तर्क अनुसंधान होता ज्ञान का सम्मान हो , साक्ष्य भी मौखिक लिखित हो छोड़ कोरी कल्पना । मीन से मेढक कहे गर व्रत करोगी निर्जला, सात जन्मों तक तुम्हारे वंश का होगा भला , व्यर्थ के उपदेश की खुलकर करो तुम भर्त्सना । कर्म में भी चेतना हो मन जतन ऐसा करो , श्रम समय उतना लगे विध्वंस या गढ्ढा भरो, सर्व हित शुभ कर्म की हर हस्त से हो स्थापना । 3 सुनो ज़रा सुनो ज़रा कच्ची पगडंडी पर बजते निरगुन पाखी के कलरव में दुआ के शगुन, हाथों में नाचती ऋचाओं को गुनो ज़रा सुनो ज़रा सुनो ज़रा आँवें पर नाच रहा भोला सा दीप स्वेद के समुन्दर में बालियों के सीप, मिट्टी के हाटों से माल खरा चुनो ज़रा सुनो ज़रा सुनो ज़रा बतख़ोरी हैं करते छिंदो के पात गुच्छों में लटकी मीठी सी सौग़ात खुरदुर से हाँथो से जीवन को बुनो ज़रा। सुनो ज़रा सुनो ज़रा। 4 भ्रांतियाँ भ्रांतियाँ कुछ भी कहे पर पूजनीया हैं दिशाएँ पूर्व की आभा प्रखर बिखरा अरुण का तेज है सांध्य पश्चिम का महल दिनमान का सुख सेज है । रात दिन परिचारिका सम दौड़ती फिरती हवाएँ । उत्तराशा अंक खेले अर्कजा मन्दाकिनी । तप्त मन को शम करे , मलयज बयारें दक्खिनी । नभ अहाते में विचरती शुभ्र सुन्दर तारिकाएँ शुभ अशुभ सब सोच मन की नियति तो निष्पक्ष है , टोटके व्यापार करते भ्रम ठगी में दक्ष है , चर चराचर पर रखें परिशुद्ध कोमल भावनाएं । 5 परम्परा निभाओ रीतियाँ बेशक मगर ये जान लो पहले, छुपा है राज क्या इनमें निभाना क्यों जरूरी है । नियम व्रत साधना संयम बने आधार अंतस के चले जब साथ में मौसम न घेरे रोग आलस के । प्रथाओं के रटो अक्षर भले ही बंद आँखों से , मगर विश्वास के बिन सब किये पूजा अधूरी है । घड़ा क्या पाप पुण्यों का कभी भी देह है देखा, करे बस भेद स्वारथ ही अहम खींचे वलय रेखा , धवल होगा नहीं काजल भले ही लाख कर उद्यम, विवशता रूढ़ियों के सामने करती मजूरी है । निकाले दूध चिड़ियों का अधिक परिहास इससे क्या, बताये मीन को निर्जल बड़ी बकवास इससे क्या , विसर्जित फूल बगिया में कभी वापस नही आया , इधर मुंडेर में कागा उड़ाता खीर पूरी है । 6 फसल कल्पनाएँ उर्वरा बंजर हकीकत हो रही , गज बराबर भूमि में एकड़ फसल की चाह क्यों , सामने मंजिल दिखे फिर तिकड़मी ये राह क्यों नेह सारे बिक गए नफरत वसीयत हो रही | मृग लुभावन देखकर ये मन हठी पीछे पड़ा , हाँथ खाली हो रहा पर दर्प आगे ही खड़ा , रोज सूरत धो रहे पर धूल सीरत हो रही | लहलहाती लोभ फसलें देख मन अति बावरा , कोठरी कालिख भरी तो कोठ कैसे धावरा | शोर से माधुर्य की अब क्षीण कीमत हो रही | नाम --आशा देशमुख जन्मतिथि -27 -3 1973 शिक्षा -एम ,ए,(समाज शास्त्र ,राजनीति शास्त्र ) संप्रति -गृहकार्य ,स्वतंत्र लेखन संपर्क -एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा (छत्तीसगढ़ ) पिन,495450 मोबा-9039695208
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