Wednesday, 26 December 2018

एक गीत बल से जब महल खड़े होते सिसकियाँ चुकातीं हैं किश्तें। भूख नींद को काट काट कर श्रद्धा सुख के सपने बोती, जीवन याआपदा प्रबंधन, सुख दुख नाजुक पलकें ढोती। यादो की सूची में रहते , जाने अनजाने सब रिश्ते। छत की एक जरूरत तनकर दुत्कारे लाखों खुशियों को । संस्कारों की बलिबेदी पर जलते देखा है सतियों को । रिक्त हाथ पर ममता भारी भरती उम्मीदों के बस्ते। बंधन तोड़े तन से साँसे, तब मरघट से मिलती काया। पंचभूत को हिस्सा देकर, फफक फफक कर रोती माया। उड़ता हंसा उड़न खटोला, भूल भुलैया के तज रस्ते। आशा देशमुख

एक गीत सादर समीक्षार्थ *अंतर* मैं शब्द नगर की बंजारन,तुम मूक महल के शहजादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले,पर तुम चलते लेकर प्यादे। अर्थों में तुम सीमा बाँधो, मैं भावों का विस्तार गढ़ूँ तुमने जड़ता के पाँव गहे, मैं गूढ़ तत्व आधार पढ़ूँ। शब्दों से तुमको नेह नही, मैं अक्षर से करती वादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले,पर तुम चलते लेकर प्यादे। शुचिता शुभता सलिला सविता, मेरी ये अन्तरज्ञ सखियाँ। बंद खिड़कियाँ महल तुम्हारे दलदल सँकरी सँकरी गलियाँ । अभिमंत्रित मेरा मन मंदिर ,तुम प्रतिमाओं से घर लादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले,पर तुम चलते लेकर प्यादे। रत्न जड़ित माला प्रिय तुमको, पर शुभ वाणी मेरे गहनें, बस काया मन में हैं अंतर, रेशम मलमल दोनों पहनें। अभिभाषण रंगीन तुम्हारे , किंतु कर्म मेरे हैं सादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले ,पर तुम चलते लेकर प्यादे। आशा देशमुख 22--10--2018--सोमवार

एक गीत आप सबके समक्ष सादर प्रस्तुत व्यथा की कथा मन वचन अरु कर्म से अभिव्यक्ति का अधिकार हो, आसुरी छल वृत्तियों का दल सहित संहार हो। चार भागों में बँटी वनिता तुम्हारी वेदना, दौपदी सीता सती वृन्दा कहें या प्रेरणा। बस अनल ही पढ़ सके दाक्षायणी के पीर को, अश्रु भी ऐसे जला ज्यों धधकता अंगार हो। वाटिका प्रत्यक्षदर्शी थी प्रणय अरु शोक की, सूर्यकुल की स्वामिनी पर हा ! नियति विश्लोक की। बाग़ वन सरिता उदधि गिरि अंततः पाताल तक, भूमिजा की यात्रा इस भाँति क्यों स्वीकार हो। युग बदलता ही रहा बदली नही पर यातना, पदवियों के कृत्य से निष्प्राण होती प्रार्थना। न्याय दस्तावेज को वृन्दा पढ़ो इक बार फिर, पक्ष तो बल का रहा इस न्याय से इंकार हो। नीर सूखे थे तभी तो रक्त माँगा केश ने, नेह रिश्तों के महल में सेंध डाली क्लेश ने। दंभ मर्यादा क्षरें आशीष सब हों मौन तब, तुम उठो हे वेदिजा अपमान का प्रतिकार हो । आशा देशमुख 27 -3-2018-मंगलवार।

एक गीत श्रम की पीड़ा श्रम सदा ही जीतता है ये कथन अक्सर सुना किन्तु श्रमिकों की दशा से मन भ्रमित होने लगा , आग चूल्हे में कहाँ रग अँतड़ियाँ जलने लगी, आँच से सहमा धुआँ पीड़ा नयन मलने लगी, हाँथ पैरोँ में सनी मिट्टी नमी है अश्रु की देखकर हालात ऐसे सच चकित होने लगा | दुग्ध स्नातित अप्सरा सी बस प्रगति दिखती क्षणिक स्वप्न टूटे कंठ सूखा स्वेद का बिखरा मणिक, रिक्त है घट सत्य का छल छल छलकता है अनृत लोभ के उन्माद से तप का अहित होने लगा | क्या नियंता रुष्ट है या खेल लालच स्वार्थ का , कर्म तो तल्लीन है इक सूत्र जप कर पार्थ का , बस प्रतीक्षा शेष अब पाताल से महि खुद हिले , आज जय का स्वर्ण रथ चढ़ छल फलित होने लगा | आशा देशमुख एनटीपीसी कोरबा

एक गीत जीवन गणित मानवी भूगोल में भी बस गणित का खेल है। पाव भर का कर्ज लेकिन सूद क्विंटल पर चढ़े, शून्य के पीछे पड़े सब शून्य जीवन पर मढ़े। हल करें या छोड़ दें हर दिन सवालों से घिरा, अंक धन ऋण भाग रेखा औ गुणन का मेल है। प्रश्न कुछ होते जटिल पर सूत्र केवल धैर्यता, ग्राफ अंको से करे तय जग किसी की योग्यता। सम विषम दोनों बराबर संधि केवल धन करे। कुछ खड़े लेकर दशमलव कुछ कटे तो फेल है। मान लो को मान लें तो क्या मजा क्या ठाट है, एक पाई पर रखें जब सौ किलो की बाट है। पल मिनट घंटा पहर दिन आयु के विस्तार में, कोण त्रिज्या सम चतुर्भुज खींच देता स्केल है। आशा देशमुख

एक गीत सादर समीक्षार्थ आदिम युग आदिम जमाने की तरफ मुड़ने लगी फिर सभ्यता। बस दो कदम ही चल सका युग रौशनी की राह में, दिनकर निकलता नित्य लेकिन जग भटकता स्याह में । पद अर्थ के प्रासाद में विद्या बनी परिचारिका, ढूढ़े कहाँ सुख चैन सच को हो गए सब लापता। विकलांग करके धर्म को भ्रम ,छल ,कपट ,धावक बनें। भोगी, विलासी ,लालची, विषयी, जगत तारक बने। पाखंड का व्यापार अरु विस्तार दोनों है वृहद आकाश तक भ्रष्टाचरण पाताल तक निर्लज्जता। धरती परोसे थाल पर मिटती नही सुरसा क्षुधा, कंचन महल में वारुणी दर दर भटकती है सुधा, कैसे करे अब भेद कोई कौन पशु है कौन नर, जब मानवी तन में भरी हो हिंस्र पशु सी क्रूरता। आशा देशमुख 24,6,2018 रविवार