Wednesday, 24 October 2018
एक गीत सादर समीक्षार्थ *अंतर* मैं शब्द नगर की बंजारन,तुम मूक महल के शहजादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले,पर तुम चलते लेकर प्यादे। अर्थों में तुम सीमा बाँधे, मैं भावों का विस्तार गढ़ूँ स्वीकार किए तुम जड़ता को मैं गूढ़ तत्व आधार पढ़ूँ शब्दों से तुमको नेह नही, मैं अक्षर से करती वादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले,पर तुम चलते लेकर प्यादे। शुचिता शुभता सलिला सविता, मेरी ये अन्तरज्ञ सखियाँ। बंद खिड़कियाँ महल तुम्हारे दलदल सँकरी सँकरी गलियाँ । अभिमंत्रित मेरा मन मंदिर ,तुम घंटाओं से घर लादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले,पर तुम चलते लेकर प्यादे। रत्न जड़ित माला प्रिय तुमको, पर शुभ वाणी मेरे गहनें, बस काया मन में हैं अंतर, रेशम मलमल दोनों पहनें। संभाषण रंगीन तुम्हारे , कर्म अधिप मेरे अति सादे। मेरा मन तो उन्मुक्त चले ,पर तुम चलते लेकर प्यादे। आशा देशमुख 22--10--2018--सोमवार
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